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प्यार का बर्थ डे

Posted: Mon Jan 23, 2012 3:21 pm
by csahab
मेरी दिल्ली. कहने को तो ये सबकी है. थोड़ी सी मेरी भी. अब मैं ऐसा कह सकता हूँ क्योंकि दिल्ली अब मेरी यादों में भी बस चुका है. मुझे रहते हुए वैसे तो कई साल हो गए हैं. पर आज भी वो पल याद है जब मेरी तुमसे मुलाकात हुई थी. कोई 7 साल पुरानी 19 जुलाई २००४ की बात है. मैं एक छोटे से शहर से दिल्ली पढ़ने आया था. वो शहर इतना भी छोटा नहीं था पर दिल्ली जितना खुलापन अभी वहां नहीं पंहुचा था. मुझे दिल्ली की हर चीज़ नई-नई और अच्छी लग रही थी फिर वो चाहे बस हो या उसके कंडक्टर. उनके टिकट काटने से लेकर बाँटने तक का तरीका मुझे बड़ा अच्छा लगता था.

मैं कॉलेज रोज़ बस से जाता था. हर दिन एक ही टाइम, एक ही बस और लगभग एक ही तरह की सवारी. पर उस दिन कोई और भी चढ़ा था उस बस में. जैसे कोई चिड़िया किसी अनजाने घोसले में जा कर सकुचा जाती है वैसे ही वो भी बस में चढ़ते वक्त थी. नज़रें झुकी-झुकी, होश उड़े-उड़े. हर कदम फूँक-फूँक के रख रही थी. शायद ही उसने बस में गौर किया होगा की पूरी बस उसे ही देख रही थी. इतने में बस वाले ने बस आगे बढ़ा दी. उसने तुरंत बस की सीट को पकड़ कर बड़े ही होले से कंडक्टर से पूछा:

”भईया ये बस मंडी हाउस जायेगी!”.

बस वाले ने हाँ में गर्दन हिलाई क्योंकि उसका मुंह मसाले से भरा था. कंडक्टर ने बेरुखी से 10 रु का टिकट आगे बढ़ा दिया. टिकट 10 मिनट तक उसने अपने हाथ में रहा क्योंकि मोहतरमा ने रुपये अपने पर्स के ना जाने किस तिलस्म में रख दिया था जो उसे नहीं मिल रहा था. हर बार एक-एक हिस्से को बड़े ही इत्मीनान से देखा जाता और हर बार निराशा मिलती. वो इस बार से बेखबर थी की पूरी बस पिछले कुछ मिनट से उसे ही देख रही है. पर शायद इस बार उसने गौर कर लिया और ये बात उसे और भी हताश कर रही थी कि वो ऐसा क्यों कर रही है. इससे ज्यादा दुःखी वो शायद इस बात से भी थी कि उसे अपने ही पर्स में रुपये नहीं मिल रहे हैं. तभी उसने अपने सर पर बड़े प्यार से हाथ मारा शायद ये हाथ अपने भूलने की आदत को ले कर था. फिर उसने दुप्पटे के कोने में बांधे हुए रुपये की पोटली को खोला और टिकट के 10 रुपये दिए. यह देख कर मेरी हंसी नहीं रुकी. पता नहीं कैसे उसने मेरी तरफ मुंह कर लिया. इसके बाद तो मेरा मुंह खिड़की की तरफ था पर मुस्कान अभी भी बनी हुई थी.

लड़की कोई 5’6 इंच लंबी, दोहरा बदन, बड़ी बड़ी ऑंखें, चेहरे पर एक अजीब सी खुशी, हाथों में 3-4 चूडियाँ जो इतने हादसों के बाद भी खामोश थी, पैरों में नागरे के साथ सलीके से सिला हुआ सूट जिसे बिलकुल उसी के नाप का बनाया गया था ना छोटा ना बड़ा. ऑंखें जितनी गहरी थी उतनी ही चंचल लग रही थी. कानों में बिलकुल पतली बाली जो उनके होने का सिर्फ अहसास करा रही थी. हवा के झोकों के उड़ते बाल और साथ में उड़ता दुप्पटा जो उसे हर बार नए ढंग से परेशान कर रहा था. कभी वो दुप्पटे को संभालती तो कभी हवा से छेड़े गए जुल्फों को.

उसके साथ वाली सीट खाली थी तो उस पर किताबों का बोझ रख दिया गया, बाकी का सारा खज़ाना पर्स में जा चुके थे. वो पूरी मेहनत से बाल और दुप्पटे को संभालने में लगी हुई थी. जैसे हवा और उसकी कोई जंग चल रही थी. जब ऐसा बहुत बार हुआ तो उसने बालों को बेमन से बैग से बैंड निकल कर बाँध लिया. शायद बालों को बांधना उसे अच्छा नहीं लगता था मुझे भी कुछ अच्छा नहीं लगा क्योंकि बाल और दुप्पटे का खेल बंद हो चुका था. पर एक नया खेल अभी भी चालू था. बाल तो बंध गए थे पर उनकी एक लट अभी भी खुली हुई थी जो फिर हवा खेलने में लग गयी बिलकुल पतंग कि तरह. मगर ये पतंग बाज़ी ज्यादा देर नहीं चली. उनको चुपचाप कानों की तरफ नाज़ुक हाथों से बढ़ा दिया गया. पतंग कि डोर कट गयी थी.

पता नहीं क्यों मुझे ये सब कुछ बड़ा अच्छा लग रहा था. वो अच्छा क्या था जो मुझे अच्छा लग रहा था उससे मैं अंजान बस के सफर का आनंद ले रहा था, पर आज मेरा मन बाहर से ज्यादा अंदर लग रहा था. तभी कंडक्टर ने आवाज़ लगायी की भईया उतर जाओ स्टॉप आ गया, उसे कल देख लेना. मुझे खुद पर बड़ी हैरानी हुई कि मैं उसे देखने में इतना खो कैसे गया.
मंडी हाउस आ चुका था. मैं उसके पीछे-पीछे उतर गया. उसके बालों से अभी भी भीनी-भीनी खुशबु आ रही थी. मैं उस खुशबू के राज़ का पर्दाफाश करने ही वाला था कि एक सुगर फ्री शहद से लिपटी मीठी आवाज़ ने तमाम खुशबु को अपने अंदर समेट लिया. सुगर फ्री इसलिए क्योंकि इस आवाज़ को आप कितनी बार भी सुन सकते थे और आपको कोई नुकसान भी नहीं होता. खुशबू को पहचनने में अपनी ऑंखें बंद कर के सारी इन्द्रियों को जगा रहा था जो उसकी आवाज़ के साथ खुली. उसने बड़े ही दिलकश अंदाज़ में मेरे ही कॉलेज का नाम ले कर पूछा

” क्या आपको पता है ये कॉलेज किधर है. मुझे मंडी हाउस से पास ही बताया था”.

मैंने कहा कि मैं भी वहीँ पढता हूँ चलिए में ले चलता हूँ. उसने बिना कुछ कहे सुराही वाली गर्दन से चलने की रज़ामंदी दे दी. मैं भी बड़े मगन से चलने लगा जैसे पता नहीं क्या हुआ हो मुझे. दिल्ली के चिपचिपे मौसम में पता नहीं कहाँ से मुझे थोड़ी-थोड़ी सर्दी लग रही थी. हर 5 कदम पर सोचता कि चलो कोई बात करता हूँ. जैसे आप किसमें पढ़ती हैं, या फिर आप क्या पढ़ती हैं. ऐसे बेतुके से सवाल पर हिम्मत ने वैसे ही हार मान ली थी जैसे अँधेरे को देख कर परछाई मान जाती है. पर उसने ख़ामोशी के उस तूफ़ान को अपने नाम के साथ उड़ा ले गयी. मेरा नाम आकृति है. जब उसने अपना नाम बताया तो रोड पर चलती बस ने भी होर्न बजाया मैंने उसका नाम नहीं सुन पाया. मैंने कहा

“क्या नाम बताया अपने अपना”?

उसने कहा अभी तो बताया आकृति. एक बार में सुनाई नहीं देता क्या! मुझे हँसी आ गयी क्योंकि मेरा अंदाज़ा सच निकला कि वह समुंद्र का वो गहरा हिस्सा है जो उपर से ही शांत है पर अंदर तूफ़ान जैसी हलचल होती है.

जिस लहजे से वो शब्द कहे गए थे वो आज भी मेरे ज़ेहन में वैसे ही ताज़े हैं जैसे कल कि बात हो. अब तो बातों का बाँध टूट चुका था. मंडी हाउस से हमारा कॉलेज कोई 500 मीटर होगा. पैदल जाने के अलावा कोई और जरिया नहीं होता था. उस दिन के वो 500 मीटर पता नहीं कैसे सिमट कर चंद कदम में बदल गए थे, लगा कि अभी 5 कदम ही तो हुए थे. वो MA करने आयी थी दिल्ली इकोनोमिक्स से. उसने वो सब बता दिया था जो वो कॉलेज आने तक बता सकती थी. फिर उसके और मेरे रास्ते वहां से अलग-अलग हो जाते थे.

उस दिन के बाद वो बस, कंडक्टर, ड्राईवर सब से सब अपने-अपने से लगते. मैं एक साल का PG कोर्से कर रहा था. और वो 2 साल वाला मास्टर कोर्स. कुछ दिनों के बाद ही मुझे अहसास हो गया कि क्यों उसके बिना वो 500 मीटर 5000 मीटर और उसके साथ 5 मीटर में कैसे बदलने लगे.

उसके बाद वो 500 मीटर का सिलसिला उसके जन्मदिन तक चला. उस दिन को भी मैं आज तक नहीं भूल पाया क्योंकि वो आज भी मेरे जीवन के सबसे खास लम्हों में से एक है. जो मेरे दिल के एक कोने में मेरी हर धड़कन के साथ जी रहा है. उसने उस दिन चलते-चलते बताया आज मेरा बर्थडे है. मैं जहां था वहीँ रुक गया क्योंकि हम उस 500 मीटर के बाद एक दूसरे के लिए अंजान बन जाते थे. मेरे पास अब बस 450 मीटर ही बाकी थे उसके साथ उसका जन्मदिन मनाने के लिए.
अचानक ही मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. मेरी ऑंखें कुछ दूंढ रही थी. मैंने कहा

” आकृति चलो तुम्हारा जन्मदिन पर केक काटते हैं ”.

उसने मुझे ऐसे देखा जैसे में पागल हो गया हूँ. उसने बड़े ही बनावटी अंदाज़ में कहा
हाँ-हाँ चलो चलो काटते हैं केक. तुम्हारी जेब में तो होगा ही ना निकालो.

हम दोनों को पता था कि हम दोनों के जेब कितने रुपये थे. उन 500 मीटर में बस एक ही बसेरा था वो था अनमोल का छत वाला ढाबा. वो कोई बहुत बड़ा ढाबा नहीं था पर हमारे लिए किसी ढाबे से कम नहीं था क्योंकि हमारे लायक सब कुछ मिलता था चाहे वो आलू के पराठे हो या चाय, नमकीन हो या फिर कई तरह की खाने पीने की चीज़. मैंने उससे 5 मिनट मांग कर अनमोल की दुकान में कुछ ढूँढने लगा. आखिरकार मुझे बर्थडे मनाने लायक लगभग सब सामान मिल गया. कम ही सही पर था तो. वो वहीँ पत्थर पर बिछे हुए बोरे के ऊपर बैठ गयी. आज फिर हवा मटरगश्ती के मूड में थी. वो एक बार फिर दुप्पटे और बालों से खेलने लगी. पर आज आकृति ने उसे ज्यादा मौका नहीं दिया. बैग से बैंड एक बार में ही मिल गया और दुप्पटे को पीठ के पीछे का रास्ता दिखा दिया गया. उसके दोनों छोरों को मिला कर बाँध दिया गया. दुप्पटा हवा के झोकों से बिना पंख के पंक्षी कि तरह तड़प रहा था.

अनमोल की दुकान में कप केक था जो शायद मेरे लिए ही बचा हुआ था. इसके साथ ही मैंने एक प्लेट साफ़ करवा कर कप केक को करीने से सज़ा दिया. दुकान से एक जली हुई मोमबत्ती भी उठा ली, अनमोल भाई बड़े ही मजे से देख रहे थे बिना कुछ बोले उनका चेहरा सब कुछ बोल रहा था. होंठों पर उनके मंद-मंद मुस्कुराहट भी मैं देख रहा था. मैंने जल्दी से मोमबत्ती को चाकू से आधा कटा और मुंह छिल कर उसे नया जैसा बनाने की पूरी कोशिश करी जिसमें में काफ़ी हद तक सफल भी रहा. आकृति को पता चल गया फिर भी वो कुछ नहीं बोली. उसने उस कप केक को काट कर दिल्ली में अपना पहला जन्मदिन मनाया. उस दिन उसे पता चल गया की वो 500 मीटर किसी के लिए कितने अहम थे और मुझे उसके शैम्पू का नाम. वही वो दिन था जब हम उस सीमा को पार कर के पहली बार बाहर निकले होंगे. उसके बाद हर कदम एक-एक साल के बराबर लग रहा था.

अब बातों में एक अजीब सा संजीदापन शामिल हो गया था. हम दोनों की चाल अल्हड़पन/लड़कपन की सीमा को तोड़ चुकी थी. क़दमों का कर्फ्यू खत्म हो चुका था और अब वो चलने के लिए आज़ाद थे. उस आजादी ने तमाम बंदिश और सीमाओं को ना जाने कितनी बार तोडा और हर बाद अपनी नई सीमाएं बनायीं और खुद ही तोड़ दी.

आज उस बात को कोई 7 साल हो गए. मेरे पास अब दिल्ली का वोटर कार्ड है, दिल भी दिल्ली के जैसा हो गया है. आज ऑफिस से छुट्टी ली है. अब मेरा दिल्ली के बहुत बड़े इलाके में छोटा सा किराये का घर है और ऑफिस कार से जाता हूँ. तेज़ी से बदल रही दिल्ली में मंडी हाउस से वो कॉलेज आज भी उतनी ही दूर है. अनमोल भाई ने वो जगह बदल कर दिल्ली में अपना एक छोटा सा रेस्टोरेंट खोल लिया है जहां आज भी कप केक मिलता है. पर आज भी वो 500 मीटर का रास्ता एक कदम भी अकेले नहीं चला नहीं जाता उसके बिना. आकृति MA करके कुछ साल दिल्ली में ही नौकरी करने लगी आज कल घर पर है और अपने 3 साल की बच्ची के साथ खेलने में समय बिताती है.

आज आकृति का बर्थडे है. हर साल की तरह मैं इस साल भी कप केक ले कर मंडी हाउस पर खड़ा हूँ. मुझे इंतज़ार है कि कब आकृति की गोद से उसी की तरह चंचल और शरारती जिसे हम प्यार से कृति कहतें है आयेगी और पापा कह कर मेरे गले से लग जायेगी. और मेरे और आकृति के साथ कदम से कदम मिला कर अपनी मम्मी का बर्थ डे 500 मीटर पैदल चल मनाएगी.

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Sat Jan 28, 2012 10:37 am
by Priyanka
so beautiful. you write so beautifully... you must write a book...

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Sat Jan 28, 2012 12:24 pm
by csahab
Thanks priyanka

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Sat Feb 04, 2012 11:47 pm
by Saumya
ati uttam :)

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Sun Feb 05, 2012 2:24 pm
by csahab
Bahut bahut shukriya

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Sat Feb 18, 2012 12:23 pm
by yogendarahul
beautifully written the first 3 para's are just awesome seems like it's its all are happen just front of my eyes i can imagine....very good.

by the way wht u do. Csahab ??

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Sun Feb 19, 2012 12:07 pm
by csahab
Thanks
I am Hindi Copywriter in ad agency dear.

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Sat Feb 25, 2012 6:46 pm
by Priyanka
but love your work :)

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Sun Feb 26, 2012 10:11 pm
by csahab
Thanks Priyanka

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Wed Feb 29, 2012 10:00 pm
by Ek Kanya
but love your writing. TRrue :)

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Wed Mar 07, 2012 3:45 pm
by shrutigoyal
Lovely :-)...

Re: प्यार का बर्थ डे

Posted: Wed Mar 07, 2012 3:59 pm
by csahab
Thanks shruti