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अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

Posted: Thu Sep 02, 2010 6:13 pm
by csahab
आप कभी कभी चाह कर भी कुछ नहीं लिख सकते क्योंकी आपका मन नहीं लगता है । कुछ करने में बहुत कुछ सितम सेहना है । इतने दिनों से ब्लॉग से दूर हूँ पर सच मानिये मन से नहीं तन से मजबूर हूँ । दिल हमेशा सही कहता है ये हर शायर कहता है । वैज्ञानिक दिल छोड कर दिमाग की बात मानने को कहता है । पर हमारे के पास दोनों रहता है । वक्त के साथ दोनों की बात मानते है और दिल बच्चा है कह कर दिल और दिमाग को शांत करते है ।

बात पिछले रविवार की है बहुत दिनों के बाद बाइक की सवारी लेने का मौका लगा क्योंकि उस दिन रविवार था । पर अकेले जाना का सुख हमें नहीं प्राप्त नहीं था नाना जी साथ मेरे साथ था । वर्ष उनके ८० है शुद्ध दही की बनी लस्सी है । चम्मच से खाने जितने गाढ़े हैं तभी तो आज भी सबके प्यारे हैं । उनको ले कर कम से कम २०० किलोमीटर की यात्रा करनी थी । वो भी बस दिल्ली के अंदर करनी थी । माथा मेरा सुबह से खराब था थोड़े रास्तों से में अनजान था । मैंने भी हेलमेट सर में लगाया एक कनटोपा नाना जी को भी थमाया । नाना जी देख कर चौके, मैं कहा पहनो नहीं तो किसी और को पकड़ो । फिर दोनों का काफिला चल पड़ा हर गड्ढे के बाद नाना के मुह से मारा गया राम फूट पड़ा । कॉमन वेल्थ के चक्कर में नाना जी का हेल्थ डोल गया पूरा बुढा शरीर झोल गया । हमने अपनी यात्रा फिर भी ना रोकी और काफिला फिर भी चलता गया । रास्ते में कुछ अजीब अजीब प्राणी से मुलाकात हुई । हालाँकि उनसे मुलाकात २० सेकंड से ज्यादा नहीं थी । पर वो कुछ दिल और दिमाग में छाप छोड गए । मैंने एक ठेठ हरयाणवी से पता पूछा उसने साथ में ४-५ और बता दिए- तू ऐसा कर सिद्धे चला जा आगे से मोड पे शर्मा जी मकान अयेगा उसे बाद अपने भतीजे का फिर एक का और आयेगा तू उसके बाद की रोड पे मुड जाना और फिर किसी से पूछ लेना । मुझे इतना गुस्सा आया गुस्सा पी के मैंने सारा गुस्सा गति बढ़ा कर निकाला । आगे एक रिक्शे वाले से पता पूछने का ख्याल दिल में आया बाद में उस ख्याल पर बहुत से जातिवाचक शब्दों से उसका अंत करवाया- भैया ये फलां पता बताओगे । उसके अंदर कस्टो मुखर्जी का साया पाया । ये पता तो मुझे मालूम है क्या तुमको यंही जाना है पर क्यों जाना है क्या बाइक से जाना है तुम दोनों को जाना है । उसके आगे सुनने से पहले में कुछ और नहीं सुन पाया और गाड़ी को आगे बढाया । जिनके वहाँ जाना था उन्ही को फोन मिलाया तब जा कर सही पता पाया । उनके मिलने के बाद मैं कंही और जाने का प्लान बनाया पर नाना जी का प्लान पहले से बना था जो उन्होंने मुझे सुनाया । मैंने भी आज खुद को पक्का भक्त बनने का ख्याब सजाया और नाना जी को बैठा कर फिर वाहन को द्रुत गति से दौड़ाया । आगे फिर रास्ता पूछने का दुस्साहस दोहराया ।

बाद में फिर यही सोचा की मुझे आज ऐसा ख्याल फिर क्यों आया । जनाब को किसी चीज़ की जल्दी नहीं थी उल्टे हमें राय देने में अपना समय बिताया । आपका जहाँ जाना है वो जगह यहाँ से दूर है एक बार और सोच लीजिए । मैंने कहा अब निकल गया हू तो जाना ही है कितने किलोमीटर होगी । २ मिनट मंथन से बाद ५ किलोमीटर मुह से निकला और जाने का सबसे लम्बा रास्ता बताया । गंतव्य स्थल पर जैसे तैसे पंहुचा पर उन सबका आभार व्यक्त करने से डरता हूँ आज बस इतना ही लिखता हूँ ।

Re: अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

Posted: Sat Sep 11, 2010 9:51 am
by TruthHurts
hahaha... so whats your thought? ask or not?

Re: अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

Posted: Sat Sep 11, 2010 1:52 pm
by csahab
GPS Is good

Re: अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

Posted: Wed Sep 22, 2010 4:45 pm
by mini15
what do you mean GPS is good?

Re: अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

Posted: Wed Sep 22, 2010 6:34 pm
by csahab
अगर मेरे पास GPS होता तो किसी से रास्ता नहीं पूछता

Re: अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

Posted: Tue Sep 28, 2010 9:12 am
by Ek Kanya
hahahh...

how our thoughts are changing. I think technology is making us more reluctant to socialize in a real life situation. 3 years from today, when GPS was not so ubiquitous, you wouldn't have said this. You would have asked someone 'official' if you didnt want to start a conversation. like perhaps the bus conductor. wouldnt you? what would be your thinking then?

Re: अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

Posted: Tue Sep 28, 2010 11:12 pm
by csahab
सोच समय के साथ बदल जाती है या यूं कहे समय सोच बदल देती है

Re: अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

Posted: Sat Oct 02, 2010 5:56 am
by Paromita
very p[rofound writings. a bit diffiult for me to reply since they are in hindi, but love reading them. thanks csahab.

Re: अजब रास्तों की थोड़ी गजब कहानी, तड़का मार के मेरी जुबानी

Posted: Sat Oct 02, 2010 4:45 pm
by csahab
Thanks Dear but i know only Hindi .......